Sunday, November 9, 2025

किसान, मीडिया और एक्टिविज़्म का दोहरा चेहरा: गन्ने की मिठास में छुपी सियासत की कड़वाहट

गन्ने की किसान, मीडिया और एक्टिविज़्म का दोहरा चेहरा: गन्ने की मिठास में छुपी सियासत की कड़वाहट

भारत में किसान को “अन्नदाता” तब तक कहा जाता है, जब तक उसका आंदोलन राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो। जैसे ही वह किसी गैर-भाजपा राज्य में सरकार से सवाल पूछता है, टीवी कैमरों के लेंस धुंधले हो जाते हैं, और “संवेदनशील” एक्टिविस्ट अचानक अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में व्यस्त नज़र आते हैं।

कर्नाटक के बेलगावी में पिछले कई हफ्तों से हज़ारों किसान गन्ने के दाम बढ़ाने की मांग कर रहे हैं । उनकी मांग भी कोई असंभव नहीं — बस ₹3,200 से बढ़ाकर ₹3,500–₹4,000 प्रति टन कर दी जाए। पर इस मुद्दे पर राष्ट्रीय मीडिया की खामोशी सुनकर लगता है — शायद उनके माइक में “South Mute Button लगा है।

गन्ने का गणित: आंकड़ों में मिठास और राजनीति की खटास


भारत में गन्ने का दाम दो स्तरों पर तय होता है —

1. FRP (Fair and Remunerative Price): केंद्र सरकार द्वारा तय न्यूनतम मूल्य।


2. SAP (State Advised Price): राज्य सरकार द्वारा निर्धारित अतिरिक्त मूल्य ।


अब देखें देश के बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों की स्थिति


राज्य मूल्य (₹/टन, 2024-25) टिप्पणी


🟩 उत्तर प्रदेश ₹3,600–₹3,700 देश में सबसे ऊँचा SAP — “राजनीतिक गन्ना बेल्ट”

🟨 कर्नाटक ₹3,300 किसान मांग रहे ₹3,500–₹4,000

🟦 महाराष्ट्र ₹3,400–₹3,600 (औसत) FRP आधारित भुगतान, मिलों द्वारा बोनस संभव

🟥 तमिलनाडु ₹3,500 के आसपास FRP से थोड़ा अधिक, राज्य सहायता


(स्रोत: PIB, MoA&FW, CaneUP, Maharashtra Sugar Commissioner, The Hindu, 2024)


किसान की जेब में छेद, सरकार के आंकड़ों में चमक


डीज़ल, खाद, बिजली और सिंचाई की लागत लगातार बढ़ रही है । गन्ने की फसल में औसतन लागत ₹2,800–₹3,000 प्रति टन तक आती है। यानि ₹3,200 के भाव पर किसान को वास्तविक लाभ नहीं, बस “जीवित रहने की गुंजाइश” मिलती है । मिलों द्वारा भुगतान में देरी और बकाया सबसे बड़ी समस्या है। 2024 तक देशभर में लगभग ₹4,000 करोड़ से अधिक का भुगतान बकाया था। कई किसान पुराने कर्ज़ या ब्याज चुकाने के लिए अपनी ज़मीन बेचने को मजबूर हुए हैं।


मीडिया का मौन, एक्टिविज़्म की चयनात्मक नैतिकता


दिल्ली बॉर्डर या यूपी-हरियाणा में आंदोलन हो तो मीडिया उसे “लोकतंत्र की आत्मा” कहता है। पर जब वही आंदोलन कर्नाटक, तमिलनाडु या महाराष्ट्र में होता है, तो वही चैनल उसे “स्थानीय मसला” बताकर चुप्पी साध लेते हैं।


एक्टिविज़्म” भी अब विचारधारा का उपभोक्ता उत्पाद बन चुका हैजहाँ मुद्दे नहीं, बल्कि नैरेटिव बेचे जाते हैं । कुछ किसान नेता टीवी पर “आंदोलन का चेहरा” बनते हैं, पर जब गैर-भाजपा राज्य में किसान सड़कों पर उतरता है, तो वही चेहरे “राजनीतिक तैयारी” में व्यस्त हो जाते हैं।


असली सवाल: किसान या कैमरा – किसका संघर्ष बड़ा?


कर्नाटक के किसानों की मांग में कोई अतिशयोक्ति नहीं —वे सिर्फ वही मूल्य चाहते हैं जो उत्तर प्रदेश के किसानों को पहले से मिल रहा है। तो क्या दक्षिण भारत के किसानों की आवाज़ उत्तर की सियासत में गूंजती है? या फिर हमारा राष्ट्र सिर्फ ट्रेंडिंग हैशटैग तक सीमित हो गया है?


रास्ता क्या है?


1. FRP और SAP में एकरूपता: एक राष्ट्रीय न्यूनतम गन्ना मूल्य तय किया जाए, ताकि किसी राज्य में किसानों का श्रम सस्ता न खरीदा जाए।

2. भुगतान में पारदर्शिता: मिलों द्वारा देरी पर ब्याज और दंड लागू हो, और सभी भुगतान पोर्टल पर ट्रैक किए जा सकें।

3. मीडिया एथिक्स में सुधार: कृषि कवरेज को राजनीतिक रेखा से मुक्त कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखा जाए।

4. किसान आंदोलन की विश्वसनीयता: नेतृत्व को विचारधारा नहीं, असली मुद्दों से जोड़ना चाहिए।


निष्कर्ष

कर्नाटक का किसान आज वही सवाल पूछ रहा है जो कल पंजाब और हरियाणा के किसान पूछ चुके हैं — “क्या हमारा मूल्य सत्ता की पार्टी देखकर तय होगा?” जब तक इस सवाल का जवाब नीति और संवेदना दोनों स्तरों पर नहीं मिलेगा, भारत की कृषि नीति चाहे कितनी भी “आत्मनिर्भर” कहलाए, गांव का किसान हमेशा निर्भर रहेगा — कभी दाम पर, कभी मीडिया पर, और कभी राजनीति पर।


Tuesday, November 5, 2024

छठ को महापर्व क्यों कहा जाता है और कैसे यह बिहार की अर्थव्यवस्था का एक पहिया है? आइए इसको समझते हैं। 

चार दिन तक चलने वाले लोक आस्था का महापर्व छठ कल (05/11/2024) नहाए खाए के साथ शुरू हो गया। आज (06/11/2024) खरना  है। 07/11/2024 को शाम का अर्घ्य दिया जाएगा। आखिरी दिन भोर के अर्घ्य के साथ महापर्व का समापन होगा।

इस बार छठ और दीवाली  के बीच का अंतर सात दिनों का हो गया। अमूमन जिस दिन को दीवाली होती है उस दिन को सुबह का अर्घ्य दिया जाता है। लेकिन इस बार दीवाली दो दिन होने की वजह से दीवाली और छठ का अंतर एक दिन बढ़ गया है।

छठ वो लोक महापर्व  है जिसमें किसी पुरोहित या पूजा कराने वाले की जरूरत नहीं होती। इस पर्व में कोई मंत्र या श्लोक, कथा कहने का प्रचलन नहीं है। पूजा में छठी मैया के गीत गाए जाते हैं और सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है।

असल में छठ सिर्फ एक  उत्सव या त्यौहार भर नहीं है। छठ परंपरा है। छठ विरासत है। छठ संस्कृति है। छठ का मतलब ऊंच नीच और छुआछूत से परे है। छठ में समाज के हर तबके की जरूरत है। छठ सबको मिलने और मिलाने का नाम है।छठ अर्थव्यवस्था का पहिया है।


इस उत्सव के लिए देश के कोने कोने से  लोग अपने गांव लौटते हैं। ट्रेन में सीट नहीं मिलती। रेलवे की आय का अंदाजा इस बात से लगाइए कि 7 हजार स्पेशल ट्रेन सिर्फ छठ के लिए चलाई जा रही है। जिनको ट्रेन का टिकट नहीं मिलता वो कार, बस से बिहार आते हैं। फ्लाइट का किराया इतना कि सरकार का कोई लगाम नहीं है। कोई पॉलिसी नहीं है। 
इस साल देश के अलग अलग इलाकों से करीब  8 लाख लोगों के बिहार आने का अनुमान है। अमूमन 5 से 6 लाख लोग हर साल आते हैं। 
बिहार के बाजार का हाल ये है कि  छह महीने में बिकने वाला फल तीन दिन में बिकेगा। बिहार में ही करीब एक करोड़ लोग व्रत करते हैं। महंगाई बढ़ी है। एक व्रती का खर्चा इस साल औसतन 5 से 7 हजार रुपया हो सकता है। इस हिसाब से  करीब 5 हजार करोड़ का कारोबार सिर्फ व्रत के सामान के लिए होगा।
इसमें हवाईजहाज, ट्रेन, कार,बस, ऑटो पर होने वाला खर्च शामिल नहीं है। इसके अलावा हफ्ते भर के लिए लोग  बाहर से बिहार जाते हैं, जिसमें साबुन, सर्फ, ग्रॉसरी पर होने वाला खर्च अलग है।
कुल मिलाकर औसतन 10 हजार करोड़ के लेन देन होने का अनुमान लगा सकते हैं। 

इस त्यौहार से कैसे समाज का हर तबका जुड़ा है उसको

सब्जी वाले से व्रत के लिए अदरक और मूली खरीदा जाएगा जो कि व्रत के लिए जरूरी है।

फल वाले से सेब, केला,  अनानास, नारियल, गन्ना खरीदा जाएगा।

कपड़े वाले से व्रत के लिए साड़ी 

चूड़ी वाले  से लहठी 

किराना वाले से मैदा,  तेल, घी,चीनी, गुड़

पान वाले से  पान

माली से फूल

हलवाई से खाजा, मिठाई

जिस घाट पर अर्घ्य दिया जाएगा उसे सजाने के लिए सजावट का सामान, लाइट, टेंट का सामान लाया जाएगा।

व्रत ऊंच नीच का  भेद मिटाने के लिए जाना जाता है लिहाजा समाज के सबसे निचले तबके में गिने जाने वालों से बांस के सूप, दउरा की खरीद होती है।

कुम्हार से कलश, ढक्कन, प्रतीकात्मक  हाथी, दीप की खरीद होगी।

व्रत करने वाले के लिए तो नया  कपड़ा खरीदा जाएगा ही। पूरा परिवार नया कपड़ा पहनेगा, सिलवाएगा । दर्जी से लेकर कपड़ा और रेडीमेड की दुकानों पर इन दिनों भारी भीड़ है। बिहार के किसी भी शहर में आप चले जाएं इस वक्त पूरा पुलिस विभाग शहर के ट्रैफिक सिस्टम को संभालने में लगा है। जाम आम बात है। दर्जी के पास ओवर लोड बुकिंग है।

इस दौरान 2 से 2.5 करोड़ पीस सिर्फ अलग अलग किस्म  की साड़ी की बिक्री होगी। छोटे बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदे जाएंगे। 

मोटे तौर पर ये बिहार  के मार्केट का अनुमान है। 

ट्रेन से उतरने के बाद स्टेशन  के बाहर जब आप आयेंगे तो टैक्सी वाला मनमाना भाड़ा बताएगा। पूछने पर कह देगा कि यही तो कमाने का सीजन है। आपसे नहीं लेंगे तो किससे लेंगे। हरों में खरीदारी के लिए  जायेंगे तो ऑटो, बस, टेम्पो में जगह नहीं मिलेगी। 

ये वो चार पांच दिन हैं जिसमें व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। लेकिन सब कुछ होगा। सारा तन्त्र इसी  में लगा होगा।

अगले साल चुनाव होने हैं उससे पहले ये नीतीश कुमार की सरकार के पास खुद को साबित करने का आखिरी मौका भी है।  इससे सरकार और सिस्टम की मार्केटिंग भी होगी। सफल आयोजन हुआ तो सरकार बेचेगी, कुछ दिक्कत हुआ तो विपक्ष।

आज नहाए खाए है।  मतलब आज के खाने में लहसुन प्याज नहीं पड़ेगा। कद्दू यानि लौकी की सब्जी खाने की परंपरा है। लौकी इम्युनिटी को मजबूत करने वाला माना जाता है। अगले दिन  खरना है। इसमें व्रत करने वाले दिन भर उपवास करेंगे। शाम को भगवान को गुड़ के खीर का भोग लगेगा। रोटी के साथ केला, मूली का प्रसाद केले के पत्ते पर चढ़ाया जाएगा।

परसों शाम को घाट पर  डूबते सूरज को अर्घ्य दिया जायेगा। इस उम्मीद के साथ कि जिसका अस्त है उसका उदय भी तय है। दुनिया पहले उगते सूरज को पूजती है यहां डूबते सूरज की पूजा पहले होती है। खिरी दिन उगते सूरज को अर्घ्य के साथ पर्व का समापन होगा। 

इस पर्व में वैसे तो प्रसाद बहुत कुछ होता है लेकिन महत्व ठेकुआ यानि मैदा या आटा से बने गुड़ और चीनी वाले पकवान का है।

छठ परंपरा का प्रतीक इस तरह से है कि व्रत करने वाला जब तक जीवित रहता है व्रत करता है। लेकिन जब उम्र और  स्वास्थ्य कारणों से करने की स्थिति में नहीं होता तब अगली पीढ़ी को सौंप देता है। वैसे कोई जरूरी नहीं है कि हर परिवार में व्रत सहने वाला और अर्घ्य देने वाला हो।

पहले घाटों पर जाकर छठ मनाने की परंपरा रही है।  लेकिन शहरी विकास में अब लोग घर की छतों पर ही पोखर बना लेते हैं उसी में अर्घ्य देते हैं। बिहार के शहरों में घर की छत पर अब छोटा सा पोखर बनने लगा है। 

छठ में गाए जाने वाले लोक गीतों से पता चलता है कि इसमें बेटा ही नहीं बेटी की मन्नत मांगी जाती है। लोक गीत की परंपरा सालों  पुरानी है। लेकिन आधुनिक बाजारवाद के दौर में शारदा सिन्हा ने छठ के लोक गीतों को अलग पहचान दी। आज दो सौ से ज्यादा छोटे बड़े गायक हैं जो छठ के गीत गा रहे हैं। पटना से लेकर मुंबई तक के स्टूडियो में गीत रिकॉर्ड किए जा रहे हैं।

छठ परिवार को एकजुट इस  तरह से करता है कि इस पर्व में अलग अलग जगह रहकर कमाने वाले भाई, बहन मिलते हैं उनका परिवार मिलता है। इसलिए छठ परिवार को जोड़ने और समाज को साथ लेकर चलने का प्रतीक माना गया है।


Thursday, May 12, 2016

प्राराथमिक शिक्षा और समस्या

"नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है...मुठ्ठी में है तकदीर हमारी......।"
            जैसा कि हम सभी जानते है कि बच्चे ही किसी देश का भविष्य होते हैं,उनका विकास देश के विकास को मजबूती देता हैं। जितना शक्तिशाली देश का बच्चा होता हैं,उतना ही उस देश का युवा प्रभावशील बनता हैं और उतना ही उज्ज्वल उस देश का भविष्य होता हैं।
         आज भारत के प्राथमिक विद्घालयो की स्थिती बहुत ही खराब हैं। न बच्चों के बैठने कि व्यवस्था सही हि न उनको जरूरी किताबें सही समय पर मिलती हैं। कितने सारे स्कूलों मे तो छात्रों और शिक्षक का अनुपात हमारी शिक्षा नीति के बिलकुल खिलाफ हैं। छात्रों के शारीरीक और मानसिक विकास के लिए स्कूलों मे कोई प्रयास ही नही किया जाता हैं।अधितर स्कूलों मे खेल का मैंदान नहीं हैं। और न ही स्कूलों मे ज्ञान-उपयोगी प्रतियोगिता कराई जाती हैं।
     बच्चे इस जमीं के तारे हैं। इस जमीं के फूल हैं। हमारी सरकारों ने इन फूलों को नहीं खिलने दिया तो फिर कौन इन्हें खिलने देगा?   माली बन कर बच्चों के स्वास्थ्य,शिक्षा, मनोरंजन और दुनिया को जानने की उसकी जिज्ञासा को जिंदा बनाए रखने के लिए उन्हें सिंचित करते रहने के लिए केवल बच्चों के माता-पिता और उनके शिक्षकों का ही उत्तरदायित्व नहीं होता हैं। बल्कि हमारी सरकारो की भी बच्चो प्रति जबाबदेही बनती हैं। हमारी सरकारे "बाल दिवस" के अवसर पर बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन और घोषणाएं कर देने मात्र से समझती हैं की उनका उत्तरदायित्व खत्म हो जाता हैं। जबकि सरकारों को चाहिए की उन योजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए शिक्षकों के साथ सहयोगात्म बर्ताव करे। ताकि बच्चों के मूलभूत जरूरतो को पुरा किया जा सके।
      बच्चों को बागवान बनना होगा। देखना होगा कि कहीं यह बचपन मुरझा न जाए। न की समान ढ़ोने के कुली....।आज बच्चों का विकास जिस रूप में होगा। वही हमें कल के आने वाले अपने घर, परिवार, समाज और देश में देखने को मिलेगा।
भ्रष्टाचार यदि इनके बचपन की जड़ों में उतर गया तो भारत का भविष्य भी हम आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा ही पाएँ। अतएव यदि हमें एक शिक्षित, सुखी और समृद्ध भारत की परिकल्पना को साकार करना है तो उसका रास्ता इसी बचपन से होकर ही गुजरेगा।
                  आज हमारी जिम्मेदारी बनती है कि कहीं न कहीं हम इन बच्चों के प्रति ईमानदार बनें। चाहे हम समाज के किसी भी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हों।

"बच्चों के नाजुक हाथों को चाँद-सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर भी ये हम-आप जैसे हो जायेंगे....।"

Tuesday, May 10, 2016

''यदि किसी देश को ख़त्म करना हो तो उसकी संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को ख़त्म कर दो, देश खुद व खुद ही ख़त्म हो जायेगा।।''
                         जिस तरह पिछले एक साल से वामपंथी और कांग्रेसी विचारधारा के बुद्धिजीवी और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ भारत की सांस्कृतिक भावनाओं को आहत करने और देश की अखण्डता को तोड़ने की कोशिश में लगी हैं। उससे एक बार फिर 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में लार्ड मैकाले द्वारा कही बातें याद आती हैं।
लार्ड मैकाले ने भारत का कोना-कोना छानने के बाद 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद में एक वक्तव्य दिया था। जिसमे उसने भारत में अपने अनुभव और भारत पर राज करने की योजना का वर्णन किया।
मैकाले ने कहा था-  ''मैं भारत के कोने कोने में घुमा हूँ,मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो,जो चोर हो, इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है,इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं,की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे,जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था, उसकी संस्कृति को बदल डालें,क्युकी अगर
भारतीय सोचने लग गए की जो भी बिदेशी और अंग्रेजी है वह अच्छा है,और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है ,तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बनजाएंगे जैसा हम चाहते हैं,एक पूर्णरूप से गुलाम भारत''। उसके बाद हमारे देश के साथ क्या हुआ यह तो हम सभी को पता हैं! और अब एक बार फिर  उसी प्रकार की सोच अपनी जड़ देश में फैलाने की कोशिश कर रहीं हैं।
                       भारत का एक तबका जो खुद को बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्ष कहता हैं। वह अभिव्यक्ति की आजादी का बहाना बनाकर उन लोगों का समर्थन कर रहा हैं, जो भारत की बर्बादी के सपने देख रहें हैं और भारत की अखण्डता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहें हैं। तथा हमारे देश के वैसे लोग कोई  जो 'भारत माता की जय' 'वन्दे मातरम्' और 'जय हिन्द' बोलते हैं या समर्थन करते है उनको देश का ठेकेदार कह रहा है।

         ..........राजू ........