Thursday, May 12, 2016

प्राराथमिक शिक्षा और समस्या

"नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है...मुठ्ठी में है तकदीर हमारी......।"
            जैसा कि हम सभी जानते है कि बच्चे ही किसी देश का भविष्य होते हैं,उनका विकास देश के विकास को मजबूती देता हैं। जितना शक्तिशाली देश का बच्चा होता हैं,उतना ही उस देश का युवा प्रभावशील बनता हैं और उतना ही उज्ज्वल उस देश का भविष्य होता हैं।
         आज भारत के प्राथमिक विद्घालयो की स्थिती बहुत ही खराब हैं। न बच्चों के बैठने कि व्यवस्था सही हि न उनको जरूरी किताबें सही समय पर मिलती हैं। कितने सारे स्कूलों मे तो छात्रों और शिक्षक का अनुपात हमारी शिक्षा नीति के बिलकुल खिलाफ हैं। छात्रों के शारीरीक और मानसिक विकास के लिए स्कूलों मे कोई प्रयास ही नही किया जाता हैं।अधितर स्कूलों मे खेल का मैंदान नहीं हैं। और न ही स्कूलों मे ज्ञान-उपयोगी प्रतियोगिता कराई जाती हैं।
     बच्चे इस जमीं के तारे हैं। इस जमीं के फूल हैं। हमारी सरकारों ने इन फूलों को नहीं खिलने दिया तो फिर कौन इन्हें खिलने देगा?   माली बन कर बच्चों के स्वास्थ्य,शिक्षा, मनोरंजन और दुनिया को जानने की उसकी जिज्ञासा को जिंदा बनाए रखने के लिए उन्हें सिंचित करते रहने के लिए केवल बच्चों के माता-पिता और उनके शिक्षकों का ही उत्तरदायित्व नहीं होता हैं। बल्कि हमारी सरकारो की भी बच्चो प्रति जबाबदेही बनती हैं। हमारी सरकारे "बाल दिवस" के अवसर पर बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन और घोषणाएं कर देने मात्र से समझती हैं की उनका उत्तरदायित्व खत्म हो जाता हैं। जबकि सरकारों को चाहिए की उन योजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए शिक्षकों के साथ सहयोगात्म बर्ताव करे। ताकि बच्चों के मूलभूत जरूरतो को पुरा किया जा सके।
      बच्चों को बागवान बनना होगा। देखना होगा कि कहीं यह बचपन मुरझा न जाए। न की समान ढ़ोने के कुली....।आज बच्चों का विकास जिस रूप में होगा। वही हमें कल के आने वाले अपने घर, परिवार, समाज और देश में देखने को मिलेगा।
भ्रष्टाचार यदि इनके बचपन की जड़ों में उतर गया तो भारत का भविष्य भी हम आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा ही पाएँ। अतएव यदि हमें एक शिक्षित, सुखी और समृद्ध भारत की परिकल्पना को साकार करना है तो उसका रास्ता इसी बचपन से होकर ही गुजरेगा।
                  आज हमारी जिम्मेदारी बनती है कि कहीं न कहीं हम इन बच्चों के प्रति ईमानदार बनें। चाहे हम समाज के किसी भी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हों।

"बच्चों के नाजुक हाथों को चाँद-सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर भी ये हम-आप जैसे हो जायेंगे....।"

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