प्राराथमिक शिक्षा और समस्या
"नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है...मुठ्ठी में है तकदीर हमारी......।"
जैसा कि हम सभी जानते है कि बच्चे ही किसी देश का भविष्य होते हैं,उनका विकास देश के विकास को मजबूती देता हैं। जितना शक्तिशाली देश का बच्चा होता हैं,उतना ही उस देश का युवा प्रभावशील बनता हैं और उतना ही उज्ज्वल उस देश का भविष्य होता हैं।
आज भारत के प्राथमिक विद्घालयो की स्थिती बहुत ही खराब हैं। न बच्चों के बैठने कि व्यवस्था सही हि न उनको जरूरी किताबें सही समय पर मिलती हैं। कितने सारे स्कूलों मे तो छात्रों और शिक्षक का अनुपात हमारी शिक्षा नीति के बिलकुल खिलाफ हैं। छात्रों के शारीरीक और मानसिक विकास के लिए स्कूलों मे कोई प्रयास ही नही किया जाता हैं।अधितर स्कूलों मे खेल का मैंदान नहीं हैं। और न ही स्कूलों मे ज्ञान-उपयोगी प्रतियोगिता कराई जाती हैं।
बच्चे इस जमीं के तारे हैं। इस जमीं के फूल हैं। हमारी सरकारों ने इन फूलों को नहीं खिलने दिया तो फिर कौन इन्हें खिलने देगा? माली बन कर बच्चों के स्वास्थ्य,शिक्षा, मनोरंजन और दुनिया को जानने की उसकी जिज्ञासा को जिंदा बनाए रखने के लिए उन्हें सिंचित करते रहने के लिए केवल बच्चों के माता-पिता और उनके शिक्षकों का ही उत्तरदायित्व नहीं होता हैं। बल्कि हमारी सरकारो की भी बच्चो प्रति जबाबदेही बनती हैं। हमारी सरकारे "बाल दिवस" के अवसर पर बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन और घोषणाएं कर देने मात्र से समझती हैं की उनका उत्तरदायित्व खत्म हो जाता हैं। जबकि सरकारों को चाहिए की उन योजनाओं को धरातल पर उतारने के लिए शिक्षकों के साथ सहयोगात्म बर्ताव करे। ताकि बच्चों के मूलभूत जरूरतो को पुरा किया जा सके।
बच्चों को बागवान बनना होगा। देखना होगा कि कहीं यह बचपन मुरझा न जाए। न की समान ढ़ोने के कुली....।आज बच्चों का विकास जिस रूप में होगा। वही हमें कल के आने वाले अपने घर, परिवार, समाज और देश में देखने को मिलेगा।
भ्रष्टाचार यदि इनके बचपन की जड़ों में उतर गया तो भारत का भविष्य भी हम आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा ही पाएँ। अतएव यदि हमें एक शिक्षित, सुखी और समृद्ध भारत की परिकल्पना को साकार करना है तो उसका रास्ता इसी बचपन से होकर ही गुजरेगा।
आज हमारी जिम्मेदारी बनती है कि कहीं न कहीं हम इन बच्चों के प्रति ईमानदार बनें। चाहे हम समाज के किसी भी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हों।
"बच्चों के नाजुक हाथों को चाँद-सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर भी ये हम-आप जैसे हो जायेंगे....।"
Thursday, May 12, 2016
Tuesday, May 10, 2016
''यदि किसी देश को ख़त्म करना हो तो उसकी संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को ख़त्म कर दो, देश खुद व खुद ही ख़त्म हो जायेगा।।''
जिस तरह पिछले एक साल से वामपंथी और कांग्रेसी विचारधारा के बुद्धिजीवी और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ भारत की सांस्कृतिक भावनाओं को आहत करने और देश की अखण्डता को तोड़ने की कोशिश में लगी हैं। उससे एक बार फिर 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में लार्ड मैकाले द्वारा कही बातें याद आती हैं।
लार्ड मैकाले ने भारत का कोना-कोना छानने के बाद 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद में एक वक्तव्य दिया था। जिसमे उसने भारत में अपने अनुभव और भारत पर राज करने की योजना का वर्णन किया।
मैकाले ने कहा था- ''मैं भारत के कोने कोने में घुमा हूँ,मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो,जो चोर हो, इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है,इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं,की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे,जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था, उसकी संस्कृति को बदल डालें,क्युकी अगर
भारतीय सोचने लग गए की जो भी बिदेशी और अंग्रेजी है वह अच्छा है,और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है ,तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बनजाएंगे जैसा हम चाहते हैं,एक पूर्णरूप से गुलाम भारत''। उसके बाद हमारे देश के साथ क्या हुआ यह तो हम सभी को पता हैं! और अब एक बार फिर उसी प्रकार की सोच अपनी जड़ देश में फैलाने की कोशिश कर रहीं हैं।
भारत का एक तबका जो खुद को बुद्धिजीवी और धर्मनिरपेक्ष कहता हैं। वह अभिव्यक्ति की आजादी का बहाना बनाकर उन लोगों का समर्थन कर रहा हैं, जो भारत की बर्बादी के सपने देख रहें हैं और भारत की अखण्डता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहें हैं। तथा हमारे देश के वैसे लोग कोई जो 'भारत माता की जय' 'वन्दे मातरम्' और 'जय हिन्द' बोलते हैं या समर्थन करते है उनको देश का ठेकेदार कह रहा है।
..........राजू ........
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