चार दिन तक चलने वाले लोक आस्था का महापर्व छठ कल (05/11/2024) नहाए खाए के साथ शुरू हो गया। आज (06/11/2024) खरना है। 07/11/2024 को शाम का अर्घ्य दिया जाएगा। आखिरी दिन भोर के अर्घ्य के साथ महापर्व का समापन होगा।
इस बार छठ और दीवाली के बीच का अंतर सात दिनों का हो गया। अमूमन जिस दिन को दीवाली होती है उस दिन को सुबह का अर्घ्य दिया जाता है। लेकिन इस बार दीवाली दो दिन होने की वजह से दीवाली और छठ का अंतर एक दिन बढ़ गया है।
छठ वो लोक महापर्व है जिसमें किसी पुरोहित या पूजा कराने वाले की जरूरत नहीं होती। इस पर्व में कोई मंत्र या श्लोक, कथा कहने का प्रचलन नहीं है। पूजा में छठी मैया के गीत गाए जाते हैं और सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है।
असल में छठ सिर्फ एक उत्सव या त्यौहार भर नहीं है। छठ परंपरा है। छठ विरासत है। छठ संस्कृति है। छठ का मतलब ऊंच नीच और छुआछूत से परे है। छठ में समाज के हर तबके की जरूरत है। छठ सबको मिलने और मिलाने का नाम है।छठ अर्थव्यवस्था का पहिया है।
इस उत्सव के लिए देश के कोने कोने से लोग अपने गांव लौटते हैं। ट्रेन में सीट नहीं मिलती। रेलवे की आय का अंदाजा इस बात से लगाइए कि 7 हजार स्पेशल ट्रेन सिर्फ छठ के लिए चलाई जा रही है। जिनको ट्रेन का टिकट नहीं मिलता वो कार, बस से बिहार आते हैं। फ्लाइट का किराया इतना कि सरकार का कोई लगाम नहीं है। कोई पॉलिसी नहीं है।
इस साल देश के अलग अलग इलाकों से करीब 8 लाख लोगों के बिहार आने का अनुमान है। अमूमन 5 से 6 लाख लोग हर साल आते हैं।
बिहार के बाजार का हाल ये है कि छह महीने में बिकने वाला फल तीन दिन में बिकेगा। बिहार में ही करीब एक करोड़ लोग व्रत करते हैं। महंगाई बढ़ी है। एक व्रती का खर्चा इस साल औसतन 5 से 7 हजार रुपया हो सकता है। इस हिसाब से करीब 5 हजार करोड़ का कारोबार सिर्फ व्रत के सामान के लिए होगा।
इसमें हवाईजहाज, ट्रेन, कार,बस, ऑटो पर होने वाला खर्च शामिल नहीं है। इसके अलावा हफ्ते भर के लिए लोग बाहर से बिहार जाते हैं, जिसमें साबुन, सर्फ, ग्रॉसरी पर होने वाला खर्च अलग है।
कुल मिलाकर औसतन 10 हजार करोड़ के लेन देन होने का अनुमान लगा सकते हैं।
इस त्यौहार से कैसे समाज का हर तबका जुड़ा है उसको
सब्जी वाले से व्रत के लिए अदरक और मूली खरीदा जाएगा जो कि व्रत के लिए जरूरी है।
फल वाले से सेब, केला, अनानास, नारियल, गन्ना खरीदा जाएगा।
कपड़े वाले से व्रत के लिए साड़ी
चूड़ी वाले से लहठी
किराना वाले से मैदा, तेल, घी,चीनी, गुड़
पान वाले से पान
माली से फूल
हलवाई से खाजा, मिठाई
जिस घाट पर अर्घ्य दिया जाएगा उसे सजाने के लिए सजावट का सामान, लाइट, टेंट का सामान लाया जाएगा।
व्रत ऊंच नीच का भेद मिटाने के लिए जाना जाता है लिहाजा समाज के सबसे निचले तबके में गिने जाने वालों से बांस के सूप, दउरा की खरीद होती है।
कुम्हार से कलश, ढक्कन, प्रतीकात्मक हाथी, दीप की खरीद होगी।
व्रत करने वाले के लिए तो नया कपड़ा खरीदा जाएगा ही। पूरा परिवार नया कपड़ा पहनेगा, सिलवाएगा । दर्जी से लेकर कपड़ा और रेडीमेड की दुकानों पर इन दिनों भारी भीड़ है। बिहार के किसी भी शहर में आप चले जाएं इस वक्त पूरा पुलिस विभाग शहर के ट्रैफिक सिस्टम को संभालने में लगा है। जाम आम बात है। दर्जी के पास ओवर लोड बुकिंग है।
इस दौरान 2 से 2.5 करोड़ पीस सिर्फ अलग अलग किस्म की साड़ी की बिक्री होगी। छोटे बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदे जाएंगे।
मोटे तौर पर ये बिहार के मार्केट का अनुमान है।
ट्रेन से उतरने के बाद स्टेशन के बाहर जब आप आयेंगे तो टैक्सी वाला मनमाना भाड़ा बताएगा। पूछने पर कह देगा कि यही तो कमाने का सीजन है। आपसे नहीं लेंगे तो किससे लेंगे। शहरों में खरीदारी के लिए जायेंगे तो ऑटो, बस, टेम्पो में जगह नहीं मिलेगी।
ये वो चार पांच दिन हैं जिसमें व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। लेकिन सब कुछ होगा। सारा तन्त्र इसी में लगा होगा।
अगले साल चुनाव होने हैं उससे पहले ये नीतीश कुमार की सरकार के पास खुद को साबित करने का आखिरी मौका भी है। इससे सरकार और सिस्टम की मार्केटिंग भी होगी। सफल आयोजन हुआ तो सरकार बेचेगी, कुछ दिक्कत हुआ तो विपक्ष।
आज नहाए खाए है। मतलब आज के खाने में लहसुन प्याज नहीं पड़ेगा। कद्दू यानि लौकी की सब्जी खाने की परंपरा है। लौकी इम्युनिटी को मजबूत करने वाला माना जाता है। अगले दिन खरना है। इसमें व्रत करने वाले दिन भर उपवास करेंगे। शाम को भगवान को गुड़ के खीर का भोग लगेगा। रोटी के साथ केला, मूली का प्रसाद केले के पत्ते पर चढ़ाया जाएगा।
परसों शाम को घाट पर डूबते सूरज को अर्घ्य दिया जायेगा। इस उम्मीद के साथ कि जिसका अस्त है उसका उदय भी तय है। दुनिया पहले उगते सूरज को पूजती है यहां डूबते सूरज की पूजा पहले होती है। आखिरी दिन उगते सूरज को अर्घ्य के साथ पर्व का समापन होगा।
इस पर्व में वैसे तो प्रसाद बहुत कुछ होता है लेकिन महत्व ठेकुआ यानि मैदा या आटा से बने गुड़ और चीनी वाले पकवान का है।
छठ परंपरा का प्रतीक इस तरह से है कि व्रत करने वाला जब तक जीवित रहता है व्रत करता है। लेकिन जब उम्र और स्वास्थ्य कारणों से करने की स्थिति में नहीं होता तब अगली पीढ़ी को सौंप देता है। वैसे कोई जरूरी नहीं है कि हर परिवार में व्रत सहने वाला और अर्घ्य देने वाला हो।
पहले घाटों पर जाकर छठ मनाने की परंपरा रही है। लेकिन शहरी विकास में अब लोग घर की छतों पर ही पोखर बना लेते हैं उसी में अर्घ्य देते हैं। बिहार के शहरों में घर की छत पर अब छोटा सा पोखर बनने लगा है।
छठ में गाए जाने वाले लोक गीतों से पता चलता है कि इसमें बेटा ही नहीं बेटी की मन्नत मांगी जाती है। लोक गीत की परंपरा सालों पुरानी है। लेकिन आधुनिक बाजारवाद के दौर में शारदा सिन्हा ने छठ के लोक गीतों को अलग पहचान दी। आज दो सौ से ज्यादा छोटे बड़े गायक हैं जो छठ के गीत गा रहे हैं। पटना से लेकर मुंबई तक के स्टूडियो में गीत रिकॉर्ड किए जा रहे हैं।
छठ परिवार को एकजुट इस तरह से करता है कि इस पर्व में अलग अलग जगह रहकर कमाने वाले भाई, बहन मिलते हैं उनका परिवार मिलता है। इसलिए छठ परिवार को जोड़ने और समाज को साथ लेकर चलने का प्रतीक माना गया है।