गन्ने की किसान, मीडिया और एक्टिविज़्म का दोहरा चेहरा: गन्ने की मिठास में छुपी सियासत की कड़वाहट
भारत में किसान को “अन्नदाता” तब तक कहा जाता है, जब तक उसका आंदोलन राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो। जैसे ही वह किसी गैर-भाजपा राज्य में सरकार से सवाल पूछता है, टीवी कैमरों के लेंस धुंधले हो जाते हैं, और “संवेदनशील” एक्टिविस्ट अचानक अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में व्यस्त नज़र आते हैं।
कर्नाटक के बेलगावी में पिछले कई हफ्तों से हज़ारों किसान गन्ने के दाम बढ़ाने की मांग कर रहे हैं । उनकी मांग भी कोई असंभव नहीं — बस ₹3,200 से बढ़ाकर ₹3,500–₹4,000 प्रति टन कर दी जाए। पर इस मुद्दे पर राष्ट्रीय मीडिया की खामोशी सुनकर लगता है — शायद उनके माइक में “South Mute Button” लगा है।
गन्ने का गणित: आंकड़ों में मिठास और राजनीति की खटास
भारत में गन्ने का दाम दो स्तरों पर तय होता है —
1. FRP (Fair and Remunerative Price): केंद्र सरकार द्वारा तय न्यूनतम मूल्य।
2. SAP (State Advised Price): राज्य सरकार द्वारा निर्धारित अतिरिक्त मूल्य ।
अब देखें देश के बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों की स्थिति
राज्य मूल्य (₹/टन, 2024-25) टिप्पणी
🟩 उत्तर प्रदेश ₹3,600–₹3,700 देश में सबसे ऊँचा SAP — “राजनीतिक गन्ना बेल्ट”
🟨 कर्नाटक ₹3,300 किसान मांग रहे ₹3,500–₹4,000
🟦 महाराष्ट्र ₹3,400–₹3,600 (औसत) FRP आधारित भुगतान, मिलों द्वारा बोनस संभव
🟥 तमिलनाडु ₹3,500 के आसपास FRP से थोड़ा अधिक, राज्य सहायता
(स्रोत: PIB, MoA&FW, CaneUP, Maharashtra Sugar Commissioner, The Hindu, 2024)
किसान की जेब में छेद, सरकार के आंकड़ों में चमक
डीज़ल, खाद, बिजली और सिंचाई की लागत लगातार बढ़ रही है । गन्ने की फसल में औसतन लागत ₹2,800–₹3,000 प्रति टन तक आती है। यानि ₹3,200 के भाव पर किसान को वास्तविक लाभ नहीं, बस “जीवित रहने की गुंजाइश” मिलती है । मिलों द्वारा भुगतान में देरी और बकाया सबसे बड़ी समस्या है। 2024 तक देशभर में लगभग ₹4,000 करोड़ से अधिक का भुगतान बकाया था। कई किसान पुराने कर्ज़ या ब्याज चुकाने के लिए अपनी ज़मीन बेचने को मजबूर हुए हैं।
मीडिया का मौन, एक्टिविज़्म की चयनात्मक नैतिकता
दिल्ली बॉर्डर या यूपी-हरियाणा में आंदोलन हो तो मीडिया उसे “लोकतंत्र की आत्मा” कहता है। पर जब वही आंदोलन कर्नाटक, तमिलनाडु या महाराष्ट्र में होता है, तो वही चैनल उसे “स्थानीय मसला” बताकर चुप्पी साध लेते हैं।
“एक्टिविज़्म” भी अब विचारधारा का उपभोक्ता उत्पाद बन चुका है — जहाँ मुद्दे नहीं, बल्कि नैरेटिव बेचे जाते हैं । कुछ किसान नेता टीवी पर “आंदोलन का चेहरा” बनते हैं, पर जब गैर-भाजपा राज्य में किसान सड़कों पर उतरता है, तो वही चेहरे “राजनीतिक तैयारी” में व्यस्त हो जाते हैं।
असली सवाल: किसान या कैमरा – किसका संघर्ष बड़ा?
कर्नाटक के किसानों की मांग में कोई अतिशयोक्ति नहीं —वे सिर्फ वही मूल्य चाहते हैं जो उत्तर प्रदेश के किसानों को पहले से मिल रहा है। तो क्या दक्षिण भारत के किसानों की आवाज़ उत्तर की सियासत में गूंजती है? या फिर हमारा राष्ट्र सिर्फ ट्रेंडिंग हैशटैग तक सीमित हो गया है?
रास्ता क्या है?
1. FRP और SAP में एकरूपता: एक राष्ट्रीय न्यूनतम गन्ना मूल्य तय किया जाए, ताकि किसी राज्य में किसानों का श्रम सस्ता न खरीदा जाए।
2. भुगतान में पारदर्शिता: मिलों द्वारा देरी पर ब्याज और दंड लागू हो, और सभी भुगतान पोर्टल पर ट्रैक किए जा सकें।
3. मीडिया एथिक्स में सुधार: कृषि कवरेज को राजनीतिक रेखा से मुक्त कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखा जाए।
4. किसान आंदोलन की विश्वसनीयता: नेतृत्व को विचारधारा नहीं, असली मुद्दों से जोड़ना चाहिए।
निष्कर्ष
कर्नाटक का किसान आज वही सवाल पूछ रहा है जो कल पंजाब और हरियाणा के किसान पूछ चुके हैं — “क्या हमारा मूल्य सत्ता की पार्टी देखकर तय होगा?” जब तक इस सवाल का जवाब नीति और संवेदना दोनों स्तरों पर नहीं मिलेगा, भारत की कृषि नीति चाहे कितनी भी “आत्मनिर्भर” कहलाए, गांव का किसान हमेशा निर्भर रहेगा — कभी दाम पर, कभी मीडिया पर, और कभी राजनीति पर।
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